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मैं संपूर्ण-- मैं अस्तित्व परिपूर्ण
निशिगंधा क्षीरसागर
मैं मुझ में पूर्ण मैं मुझ में संपूर्ण अस्तित्व सारा मुझ में अनुभव मुझी में समाया मैं हि सम्पूर्ण अस्तित्व मैं हि मुझ में परिपूर्ण...... II 1 II जीवन केवल एक प्रतिबिंब अनुभव छाया मैं हूं बिंब सदा सें पूर्णता होकर भी क्यूँ भटकता समझता अपूर्ण ? कुछ भी नही ऐसा मैं शून्य जिसमे समेटा हुवा सारा अस्तित्व सब कुछ समेटा हुवा शून्य मैं शून्य होकर सम्पूर्ण मैं मुझ में परिपूर्ण ...... II 2 II अनादी अनंत मैं असीमित अज्ञान सें हुवा सिमीत अज्ञानता सें चंचल खोज यहाँ वहा इधर उधर खोज रहा सृष्टी में बाहर पूर्णता होकर भी ढुंढे बाहर ढुंढे अंधियारे में जाकर इसीलिये.... जनम् जनम् प्यास न बुझी मैं शून्य कुछ भी नही सबकुछ समेटा हुवा मैं शून्य शून्य होकर मैं सम्पूर्ण मैं मुझ में परिपूर्ण मैं शून्य होकर सम्पूर्ण मैं मुझ में परिपूर्ण ...... II 3 II ब्रह्म का प्यारा पुत्र अज्ञानवश हुवा जीव विलग शेरसें बिछडा उसका शावक बकरे कीं झुंड में पला क्या वह बकरा बना ? अज्ञानता का घना बादल ढक गया गहिरा आवरण भूल गया खुद का स्मरण गायक का बेटा रोता रोते रोते अपनेआप गाता गाना उस कीं खून में बहता जो खून में वही उभरता अज्ञानता कीं कठीन दरी इस को लांघनें कीं दूरी ज्ञान सें इसे साधकर मैं मुझसें कैसे अनभिज्ञ ? मैं मुझसें कैसे अज्ञ ? ज्ञान सें बन जाय सूज्ञ ...... II 4 II मैं कौन हूं भूल गया अस्तित्व का प्रश्न सामने खडा खोजे धुंडे यहाँ वहा जो खोजेगा वह पायेगा गुरु दिखलाये सही दिशा गुरुसंनिध प्रश्नका हल मिला अस्तित्व कीं यह पहेली ज्ञान सें आसानी सें सुलझी अस्तित्व प्रकृती माया सारी आवश्यक सारे अनुभव देती अस्तित्व अनुभव मुजहि में समाया जीवन अनुभव सामने सारा कोई मुझे क्या देगा मैं हि सबकुछ याचक दाता सत असत सबकुछ मेरा जड चेतन सें शरीर बना अज्ञान सें जो पकडे रखा ज्ञान सबकुछ धों देगा ...... II 5 II क्या है मेरा वजुद यहाँ ? खुदके गिरेबान में झाको जरा क्या पकडा है... देखो जरा मैं मेरा माया मोह ममता सबकुछ मिथ्या प्रतिती जीवन सारा जिसको पाया आभास जाना सच्चाई जानकर भ्रम पाया सवाल मेरे वजुद का... अनसुलझे प्रश्न अस्तित्व का.... उत्तर खोजने निकल पडा मैं मुझसें कैसे अनजाना ? ब्रह्म का बच्चा जीव कैसे बना ? सम्पूर्ण होकर क्यूँ समझू अपूर्ण ?...... II 6 II भ्रम है रूपरंग आकार काया भ्रम है उपाधी रिश्ते इच्छा भ्रम है मन विषय वासना आशियाना रेत का ढेह गया जो समझा सब मिट्टी हुवा मुठ्ठी खोलकर छोड दिया सबकुछ एक है दर्शन हुवा घटाकाश चिदाकाश मिट्टी घडा दृष्य द्वैत भ्रम है सारा सब कुछ मिट्टी तत्व जाना नेती नेती समझाती माया दृष्टीभ्रम जीवन असत्य जाना असत संसार जगत पदार्थ असत में सत कैसे देखोगे ? पाने सें क्या पाओगे ??.... जो पाओगे भ्रम जानोगे हाथ आयेगा... कुछ नही त्याग सें सब पाओगे मिलेगा सब-कुछ जब छोडोगें त्याग सें हि शाश्वत शांती त्याग में हि आनंद संतुष्टी सफल जीवन का मूलमंत्र यही जनम् मरण सें मिल जाये छुट्टी ...... II ७ II कैसे होगी जीवन सें छुट्टी ?? कैसे मिलेगी बंधन सें मुक्ती ?? श्रवण मनन विचार बुद्धी सें विवेक करे जानकर बुद्धी सें संसार को त्यागकर मन में विवेक सें वैराग्य जोडने सें वृत्ती सुखं भोग छोड संसाराकार मन को करे निर्विकार मन को करे ब्रह्माकार जो ब्रह्म को जानेंगा वह ब्रह्म हो जायेगा जो खोजेगा वह पायेगा जो चाहेगा मिल जायेगा जो जानेगा वह होवेगा बरखा बरसी अद्भुत गुरुकृपा मैं मुझ को मिल जायेगा मैं खुद सें मिल जाऊंगा बिंब प्रतिबिंब शून्य और पूर्ण अज्ञान अपूर्णता ज्ञान पूर्णता सब कुछ मुझ में मैं इन सब सें मैं अस्तित्व द्रष्टा संपूर्णता मैं मुझ में संपूर्ण मैं पूर्ण अस्तित्व परिपूर्ण .... मैं पूर्ण अस्तित्व परिपूर्ण ...... II ८ II
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