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जब 'होना' शेष रह जाता है
कनिका
एक शिष्य कई महीनों से एक अत्यंत शांत और गहरे अनुभव से गुजर रहा था। उसने अपने गुरु से कहा गुरुजी, पहले जब मैं सोता था, तब स्वप्न आते थे। कभी सूक्ष्म अनुभव होते थे, कभी अनेक दृश्य दिखाई देते थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों से सब कुछ बदल गया है। अब रात में सोते समय कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे मैं देख पा रहा हूँ कि विचार धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। पहले मन शांत होता है फिर स्मृतियाँ पीछे हटती हैं फिर व्यक्तित्व जैसे विलीन होने लगता है। एक क्षण ऐसा आता है जहाँ न कोई विचार रहता है, न कोई पहचान। यहाँ तक कि मैं यह शरीर हूँ का एहसास भी समाप्त हो जाता है। उसके बाद केवल होने का एक मौन एहसास रह जाता है। उस अवस्था में कोई दृश्य नहीं होते, कोई अनुभव नहीं होते, कोई कल्पना नहीं होती। फिर भी ऐसा नहीं लगता कि मैं पूरी तरह अचेत हूँ। समय का कोई अनुभव नहीं रहता। जो अनुभव एक पल जैसा लगता है, उसके बाद जब शरीर का एहसास लौटता है, तब पता चलता है कि कई घंटे बीत चुके हैं और सुबह हो चुकी है। सबसे अद्भुत बात यह है कि सुबह शरीर थका हुआ नहीं लगता। भीतर एक गहरी शांति और आनंद बना रहता है। क्या यही वह स्थिति है जहाँ मनुष्य होने की कल्पना समाप्त होने लगती है? जहाँ न मन रहता है, न शरीर का एहसास केवल शुद्ध होना बचता है? गुरु मुस्कुराए और बोले वत्स, लोग अक्सर स्वप्नों और सूक्ष्म अनुभवों को आध्यात्मिक उन्नति समझ लेते हैं। लेकिन चाहे अनुभव स्थूल हों या सूक्ष्म वे अभी भी मन के क्षेत्र में ही होते हैं। जब तक कोई दृश्य है, कोई अनुभव है, तब तक मन मौजूद है। लेकिन अब जो तुम्हारे साथ हो रहा है, वह अलग है। अष्टावक्र ने कहा था तुम न जाग्रत अवस्था हो, न स्वप्न, न गहरी नींद। तुम इन सबके साक्षी हो। सामान्य मनुष्य गहरी नींद में अचेत हो जाता है। जागने के बाद केवल इतना कहता है मैं बहुत गहरी नींद में था। लेकिन यह जानना शरीर और मन में लौटने के बाद आता है। तुम्हारे अनुभव में विशेष बात यह है कि कभी-कभी सजगता नींद में प्रवेश के उस सूक्ष्म क्षण में भी बनी रहती है। इसलिए तुम प्रत्यक्ष देख पा रहे हो कि विचार समाप्त हो रहे हैं व्यक्तित्व विलीन हो रहा है मैं यह शरीर हूँ की भावना भी गायब हो रही है और फिर भी होना बना हुआ है। यही सबसे बड़ा रहस्य है। अष्टावक्र ने कहा यदि तुम शरीर को अलग और चेतना को अलग जान लो, तो इसी क्षण शांत, सुखी और मुक्त हो जाओगे। वत्स, व्यक्तित्व वास्तव में स्मृतियों, विचारों और शरीर की पहचान का निरंतर प्रवाह है। जब यह सब शांत हो जाता है, तब जो बचता है वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। इसीलिए यह अवस्था इतनी शांतिपूर्ण और आनंदमय लगती है। क्योंकि वहाँ संघर्ष करने वाला मन नहीं है। वहाँ कोई कहानी नहीं है। कोई नाम नहीं है। केवल मौन उपस्थिति है। याद रखो स्वप्न केवल रात के दृश्य नहीं हैं। व्यक्तित्व भी एक प्रकार का स्वप्न है। और शायद पहली बार तुम उस मौन को छू रहे हो, जहाँ केवल अस्तित्व बचता है शांत निराकार अपरिवर्तनीय और सदा उपस्थित। याद रखो बस इसे पकड़ने की कोशिश मत करो। जैसे ही मन इसे दोहराना चाहेगा, वह फिर सक्रिय हो जाएगा। केवल साक्षी बने रहो। <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/18047910-ChatGPT Image May 7, 2026, 12_11_06 PM.png'></div><br><br> <br><br>
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