ज्ञानाक्षर
कविता संग्रह - ३
अमिताभ
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१.**ज्ञान बीज** कृपा का बादल बरसा ज्योंहि, ज्ञान बीज ने ली अंगड़ाई। धरती का सीना फाड़ के देखो, नव पल्लव निकल आई। शीघ्र लगेंगे पत्ते आनंद के, खूब खायेगी झोंके तरूणाई। खिलेंगे फूल परम प्रेम के, सुगंधित कलियां खिल आईं। शांत शीतलता के छांव में छन- छन बहेगी हवा मधुराई। पूर्णता के मौन में चीर -स्थित हुई वट-वृक्ष की गहराई। अब उसकी गोदी में पनपेंगे, नए ज्ञान-बीजों की मदुराई। कृपा का बादल बरसा ज्योंहि, ज्ञान बीज ने ली अंगड़ाई। २. **सच्चा** फिर से बचपन लौट आया है, फिर से बच्चा बन गया हूँ मैं। सब सयानापन छिन गया है, फिर से कच्चा बन गया हूँ मैं। सब पुरातन छुट चुका है अब, थोड़ा अच्छा बन गया हूँ मैं। छोड़ आया झूठ का आंगन, फिर से सच्चा बन गया हूँ मैं। ३. **देवी माया** नित्य हूं मैं, मेरे रूप हैं कई। कहीं छांव है मेरी तो धूप कहीं। सारा जगत ही हूं मैं, कुछ भी खाली नहीं। सही त्योहारों में मैं सिर्फ दिवाली नहीं। बड़ी चंचल हूं मैं ना मेरा कोई छोर। मतवाले हुए सब खींचे आए मेरी ओर। मिलती नहीं मैं किसी को कहीं। उनको क्या है पता मैं तो हूं ही नहीं। पर चाहूं मैं उनको जो प्रभु हैं मेरे वो रहते सदा और बदलते नहीं। शिव हैं वो मेरे मैं शक्ति उनकी मेरे ही तो है क्या करूं भक्ति उनकी। अलग होके उनसे मैं विभक्त हो गई, जो उनसे मिली उनकी भक्त हो गई। अलग जो हुई सारी शक्ति छिनी, जो वो मुझको मिले मैं सशक्त हो गई। ४.**गुरुप्रेम** गुरु जो मिले सारा जग मिल गया। माया-कीचड़ में पड़ा कमल खिल गया। मन की बगिया खिली, सुगंध घुल गया। अंधेरे सागर से निकल सूरज खुल गया। गुरुजी, जो अब हो मिले छोड़ जाना नहीं। दूजा मिलेगा कभी अब ठिकाना नहीं। करो कृपा हे गुरु, निकालो इस मझधार से सारा जहां मिल गया, कुछ और पाना नहीं। ५. **अपरोक्ष अनुभव** सौ किताबें पढ़ कर भी पानी का स्वाद पाया नहीं। एक घूंट गुरु ने पिलाई तो मैने कहा, ये स्वाद तो किताबों में था ही नहीं। जमीन पर कर तैरने का अभ्यास कूदा पानी में जो मैं। डूब ही गया था लेकिन गुरु ने सहारा दे दिया निकाल। बिना गुरु के जो मैं करता रहा उल जुलूल प्रयास, न मिली सफलता चाहे जितना किया अभ्यास। बात आई समझ में दूर हुआ मेरा अज्ञान बिन गुरु के, बुद्धिबल पर नहीं मिलेगा ज्ञान। सौ गीत गाके प्रेम के भी प्रेम को मैं जान पाया नहीं। प्रेम जो हुआ तो समझा कि था ये गीतों में नहीं। ६. **मनन** मनन कैसे मैं करूं, मेरा तो मन ही खो गया। जो मैं मुझको मिला, मैं तो मैं ना रहा। सारी दुनिया मिटी, मैं सिमट सा गया। अज्ञान का पर्दा हटा तो अहम मिट गया। सब में दिखती है मुझको परछाई मेरी, देखें चाहे जिसे लगे मैं से मैं ही मिल गया।