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खेल खिलावा भ्रम भुलावा
निशिगंधा क्षीरसागर
खेल खिलावा देखना दिखाना छल है... या है छलावा ? भूल हुई... दिखता भुलावा जगत दिखता दृष्टी का भ्रम घडे कें पीछे तत्व का सच जगत दिखता क्या है सच? दुनिया को लेकिन माना सच नाम लौकिक इज्जत दिखाता किसकी इज्जत नाम किस का? मैं मेरा कितना यह दिखावा कौन क्यूँ का करता है दिखावा मैं मेरा कीं हटती नही माया मिथ्या अस्तित्व का कैसा भुलावा? जो कभी हुवा नही लंबा सा एक सपना लगता सत्य यही सारा संसार यहाँ खेल खिलावा खेल खेल का बनता छलावा रिश्ते नाते मित्र परिवार सगा लेनदेन द्वेष प्यार बंधन कर्म का अज्ञान अहं अंध:कार प्रभु कीं लीला अनादी चल रही यह अनोखी लीला छलावे सें मात्र छुटे कोई बिरला भूल गया खेल को खेलना खेल को हि सत्य मान बैठा मैं मेरा मिथ्या में फसा मैं हि परिधी का केंद्र बना बंधन का यही कारण बना गतिशील जगत दिखता सदा जगत सें हि खुद को जाना खुद में ठहरना भूल गया जो दिखता होता नही जो होता दिखता नही असत दिखता होता नही सत्य कीं है सत्ता न्यारी सत कें सिवा कुछ भी नही लेकिन सत दिखता नही दृष्य मिथ्या और दृष्टी माया दिखाना देखना बुद्धी का काम लेकिन बुद्धी तो है माया स्वार्थ छोड नि:स्वार्थ होना समग्र दृष्टी सें है देखना बस्स इतना है मन को मनाना बुद्धी तर्क सें विवेक विचार बुद्धी कें सहारे पार हो संसार अज्ञान को हटा दूर कर भ्रम संसार माया बुद्धी भी भ्रम माया दिखलाने का करे काम चित्त कें कारण चित्र का भ्रम वरना केवल एकता और अद्वैत सदा सें है निर्गुण नित्य निर्मम गुरुकृपा सें दृष्टी बदले मृगजल कीं मिथ्या समझे उलझन सारी झट सें सुलझे क्या देखना? क्या दिखाना? बस्स केवल एक खेल नित्य सदा सें चल रहा... खेल को खेल हि मानो खेल खेल में आनंद लों लीला उसकी यह जान लों और द्रष्टा दृष्य एक है मानो दृष्य में विलीन हो जाओ बस्स जो है सो हो जाओ
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