आरोहण


परिभाषा

  • आरोहण चित्त की वह उर्ध्वगामी गति है जिसमें साधक का ध्यान और चेतना निचली (स्थूल) परतों से हटकर ऊपरी (सूक्ष्म) परतों और लोकों की ओर जाने लगती है।
  • चित्त का संपूर्णता में अर्थात ब्रह्म में विलीन हो जाना ही अंतिम आरोहण है।

मुख्य शिक्षाएं

  • आरोहण अवतरण की ठीक विपरीत प्रक्रिया है; जहाँ अवतरण में चेतना निचले लोकों और शरीरों की ओर संकुचित होती है, वहीं आरोहण में चेतना का विस्तार होता है।
  • जैसे-जैसे जीव का विकास होता है और अज्ञान का नाश होता है, उसका ध्यान ऊपरी परतों जैसे कारण शरीर या सूक्ष्म इंद्रियों की ओर स्वतः बढ़ने लगता है।
  • आरोहण के द्वारा जीव पशुवृत्ति और सामान्य मनुष्यवृत्ति के बंधनों को पार करके दिव्यता और देववृत्ति की ओर गति करता है।
  • पूर्ण आरोहण की अवस्था में साधक के चित्त का अज्ञान नष्ट हो जाता है और वह अपने वास्तविक अद्वैत स्वरूप में विलीन हो जाता है।

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