गुरु-शिष्य परंपरा


परिभाषा

  • यह कोई व्यावसायिक ढांचा नहीं है, बल्कि शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति का एक पावन और मार्गहीन मार्ग है।

मुख्य शिक्षाएं

  • ज्ञानमार्ग में किसी बहुमंजिली संस्था, संप्रदाय या आधिकारिक व्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता; यहाँ केवल गुरु और शिष्य का सीधा संबंध होता है।
  • बिना गुरु के ज्ञानमार्ग पर आगे बढ़ना अत्यंत कठिन है, क्योंकि गुरु के बिना साधक के पुनः भ्रामक मान्यताओं में गिरने और अहंकारवश पतन होने की आशंका बनी रहती है।
  • इस परंपरा में गुरु शिष्य को बाहर से कोई नया ज्ञान लाकर नहीं थोपता, बल्कि केवल उसके अपने अपरोक्ष अनुभव और ठोस तर्क की ओर संकेत करता है।
  • जो शिष्य ज्ञान और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित और आज्ञाकारी होता है, वह बहुत तीव्र गति से अज्ञान की कड़ियों को काटकर मुक्त हो जाता है।

देखें


Edit This Article History