परिभाषा
- बंधन अज्ञान के कारण चित्त द्वारा निर्मित वह भ्रामक और काल्पनिक सीमा है जिसमें जीव स्वयं को शरीर, मन या व्यक्ति मानकर माया के नियमों और संसारी वासनाओं के अधीन कर लेता है।
मुख्य शिक्षाएं
- बंधन का मूल कारण अपने सत्य स्वरूप का अज्ञान और अनित्य, परिवर्तनशील अनुभवों (जैसे शरीर, भोग-विलास, संबंधों) के प्रति होने वाली तीव्र आसक्ति है।
- जब तक जीव स्वयं को पृथक कर्ता मानता रहता है, तब तक वह कर्मों के फलों (संस्कारों) और जन्म-मृत्यु के इस अंतहीन चक्र के बंधन में फँसा रहता है।
- संसारी इच्छाएं और वासनाएं जीव को क्षणिक स्वतंत्रता का आभास तो देती हैं, परंतु यथार्थ में वे जीव को यांत्रिक रूप से पिंजरे में बांधने वाली बेड़ी के समान हैं।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, बंधन कोई ठोस भौतिक वस्तु नहीं है; यह केवल एक अज्ञानपूर्ण मानसिक तादात्म्य है, जो आत्मज्ञान के उदय होते ही क्षण भर में विलीन हो जाता है।