परिभाषा
- मनन ज्ञानमार्ग की त्रिविध साधना का दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें श्रवण द्वारा प्राप्त किए गए सत्यों और उपदेशों का बुद्धि व विवेक के द्वारा गहन विश्लेषण और प्रयोगात्मक परीक्षण किया जाता है।
- मनन का मुख्य उद्देश्य सुनी-सुनाई बातों के अंधविश्वास को नष्ट करके ज्ञान को स्वयं के अनुभव में प्रमाणित करना है।
मुख्य शिक्षाएं
- मनन की प्रक्रिया में साधक सात मूल प्रश्नों का उपयोग करके सत्य-असत्य और उसके कारणों का निष्पक्ष एवं विवेकपूर्ण निर्धारण करता है।
- जब तक चित्त में कोई भी संशय, दुविधा या प्रश्न शेष रहता है, तब तक मनन की यह तार्किक साधना जारी रहती है — जब तक कि ज्ञान पूरी तरह निश्चित न हो जाए।
- गंभीर मनन के लिए एकांत, शांत मन और दीर्घकालिक ध्यान की आवश्यकता होती है, जहाँ साधक समस्त बाह्य विक्षेपों और कोलाहल से दूर होकर केवल सत्य पर केंद्रित रहता है।
- जब मनन परिपक्व हो जाता है, तो सभी प्रकार के संशय नष्ट हो जाते हैं और प्राप्त हुआ ज्ञान साधक की चेतना में निदिध्यासन के लिए पूरी तरह स्थापित हो जाता है।