आत्म-मूल्यांकन


परिभाषा

  • आत्म-मूल्यांकन (या आत्ममूल्यांकन) ज्ञानमार्ग पर साधक द्वारा अपने आंतरिक विकारों, सीमाओं, अज्ञान के स्तर और साधना की स्थिरता को निष्पक्षता से जांचने की एक प्रक्रिया है।
  • यह साधना का वह चरण है जहाँ साधक सत्य के प्रकाश में अपने विचारों, वाणी और कर्मों की त्रुटियों का स्व-अवलोकन करता है।

मुख्य शिक्षाएं

  • साधक स्वयं का अवलोकन करके यह पहचान करता है कि चित्त में कहाँ अशुद्धि या अज्ञान शेष है जो उसे वास्तविक स्वरूप में स्थिर होने से रोकता है।
  • यदि साधक प्राप्त हुए ज्ञान को बार-बार भूल जाता है या उसका मन अशांत रहता है, तो उसे आत्म-मूल्यांकन के द्वारा उन अशुद्धियों को खोजना पड़ता है ताकि शुद्धिकरण के उपाय किए जा सकें।
  • आत्म-मूल्यांकन में साधक षट सम्पत्ति के गुणों (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान) की स्थिरता का निष्पक्ष स्व-परीक्षण करता है।
  • यदि साधक अपनी बुद्धि से अज्ञान या अशुद्धि की पहचान नहीं कर पाता, तो उसे गुरु की शरण में जाकर मार्गदर्शन और आत्म-मूल्यांकन में सहायता लेनी चाहिए।

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