परिभाषा
- प्रेम (सच्चा आत्मिक प्रेम) अनुभवकर्ता की वह अखंड और वास्तविक अवस्था है जहाँ दो पृथक सत्ताओं का भ्रामक अलगाव विलीन होकर अद्वैत एकता में बदल जाता है।
- जब 'मैं' और 'तूं' की काल्पनिक सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, तो उसे ही परम प्रेम कहते हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- सांसारिक स्तर पर जिसे प्रेम कहा जाता है, वह वास्तव में केवल स्वार्थ, कामवासना, आसक्ति और अहंकार का ही मिला-जुला रूप होता है जो अंततः दुःख का कारण बनता है।
- सच्चा और निस्वार्थ प्रेम तब जागृत होता है जब साधक को यह आत्मज्ञान होता है कि 'सभी जीव मेरा ही रूप हैं और सभी का मूल तत्व केवल एक ही अनुभवकर्ता है'।
- चूंकि संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल एक ही चैतन्य सूत्र (साक्षी) व्याप्त है, इसलिए सभी के प्रति स्वतः ही गहरी करुणा और समभाव का जो उदय होता है, वही प्रेम है।
- अनुभवकर्ता स्वयं प्रेम स्वरूप है; अतः इस सत्य को जान लेना ही सभी द्वेषों, भयों और विभाजनों का सदा के लिए अंत करना है।