परिभाषा
- एकता (या अद्वैत) अस्तित्व की वह अविभाज्य और अखंड स्थिति है जिसमें अनुभव और अनुभवकर्ता का पूर्ण विलय हो जाता है।
- यह बोध होना कि 'सब कुछ एक ही है, दो नहीं' ही वास्तविक एकता कहलाती है।
मुख्य शिक्षाएं
- एकता का कोई सीधा बौद्धिक ज्ञान संभव नहीं है; क्योंकि इसे 'एक' कहना भी गिनती के अंतर्गत द्वैत लाना है, इसीलिए ज्ञानमार्ग पर इसे एकता न कहकर 'अद्वैत' (दो नहीं) कहा जाता है।
- अस्तित्व में अनेकता, भेद या अलगाव का प्रतीत होना केवल चित्त की विभाजनकारी वृत्ति के कारण है, जो कि सत्य के मानदंड पर असत्य (मिथ्या) सिद्ध होती है।
- जब साधक साक्षी (अनुभवकर्ता) और साक्ष्य (अनुभव) दोनों के काल्पनिक पृथकता के भ्रम को तोड़कर केवल अनुभवक्रिया में स्थित होता है, तब वास्तविक एकता या सहज समाधि घटित होती है।
- यह एकता ही सच्चे आत्मिक प्रेम का मूल स्रोत है; जब यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि सभी मेरा ही रूप हैं और सबका तत्व एक ही है, तब राग-द्वेष और भय का सदा के लिए अंत हो जाता है।