परिभाषा
- मत किसी व्यक्ति, संप्रदाय या परंपरा द्वारा बिना किसी अपरोक्ष अनुभव या ठोस तर्क के बनाया गया व्यक्तिगत विचार, दृष्टिकोण या विश्वास है।
- ज्ञानमार्ग पर मत को सत्य का विकल्प या ज्ञान का साधन नहीं माना जाता; यह केवल मन की एक परिवर्तनशील वृत्ति है।
मुख्य शिक्षाएं
- मत और सत्य में गहरा अंतर है; मत सदैव व्यक्तिनिष्ठ और परिवर्तनीय होते हैं, जबकि सत्य सदा अपरिवर्तनीय होता है।
- अज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत दूसरों के मतों को बिना जांचे-परखे स्वीकार कर लेना है, जिसे बचपन से मतारोपण के माध्यम से बालक बुद्धि में भर दिया जाता है।
- ज्ञानमार्ग के साधक को सभी प्रकार के संप्रदायों, मतों और पहले से मान ली गई भ्रामक धारणाओं से पूरी तरह मुक्त (पूर्वाग्रह रहित) होना चाहिए।
- किसी भी मत को केवल इसलिए सत्य नहीं माना जा सकता क्योंकि वह बहुत प्राचीन है या उसे अधिकांश लोग मानते हैं; उसका स्वतः अनुभव द्वारा सत्यापन अनिवार्य है।