परिभाषा
- सत्य अनुभवों का वह वर्गीकरण है जो अटल मानदंडों पर आधारित होता है।
- ज्ञानमार्ग पर सत्य का एकमात्र परम मापदंड यह है कि जो सदैव अपरिवर्तनीय रहता है, वही सत्य है। जो बदलता है वह असत्य है।
मुख्य शिक्षाएं
- सत्य के दो स्तर होते हैं: परमार्थ सत्य (परम सत्य, जो कभी नहीं बदलता) और व्यावहारिक सत्य (विसत्य, जो केवल लोक-व्यवहार में काम आता है)।
- संपूर्ण दृश्य ब्रह्मांड, शरीर और मन के अनुभव निरंतर परिवर्तनशील होने के कारण असत्य (मिथ्या या माया) हैं। केवल अचल और नित्य रहने वाला अनुभवकर्ता (साक्षी) ही परम सत्य है।
- व्यावहारिक सत्य (विसत्य) वह सापेक्ष सत्य है जो व्यवहार और उत्तरजीविता में काम आता है - जैसे जगत की वस्तुएं, जो बदलती हैं पर व्यवहार में वास्तविक मानी जाती हैं।
- सत्य की विशेषता यह है कि वह अत्यंत सरल और स्वतः सिद्ध होता है, उसे याद नहीं रखना पड़ता; जबकि असत्य (झूठ) अत्यंत जटिल होता है। सत्य को अपरोक्ष अनुभव और तर्क से जाना जाता है, अंधविश्वास से नहीं।