परिभाषा
- जब नादरचनाएं एक निश्चित नियम के तहत स्वतः को दोहराने लगती हैं, तो उन्हें प्रक्रिया कहा जाता है।
मुख्य शिक्षाएं
- संसार की सभी दृश्य वस्तुएं और जीव वास्तव में केवल विभिन्न संरचनाओं और उनमें चलने वाली प्रक्रियाओं का एक सुव्यवस्थित संगठन मात्र हैं।
- ये प्रक्रियाएं ही नई नादरचनाओं का सृजन करती हैं, उनका पोषण व नियंत्रण करती हैं और उन्हें नष्ट (विनाश) करती हैं।
- अस्तित्व और अनुभवकर्ता स्वयं पूरी तरह से प्रक्रियाहीन और निष्क्रिय हैं; उनके होने की कोई प्रक्रिया नहीं होती क्योंकि वे स्वयंभू और स्वतः सिद्ध हैं।
- चित्त में चलने वाली सभी प्रक्रियाएं (जैसे विचार, इच्छाएं, भावनाएं) केवल क्षणभंगुर परिवर्तन हैं, अतः वे सत्य के मानदंड पर असत्य (मिथ्या) हैं।