परिभाषा
- बोधिसत्व वृत्ति चित्त की वह परम जागृत, उदार और निष्काम अवस्था है जिसमें साधक स्वयं के दुखों का सदा के लिए अंत (निर्वाण) करने के बाद भी केवल करुणावश संसार में रहकर अन्य जीवों को मुक्ति दिलाने के कार्य में संलग्न रहता है।
- यह ज्ञानमार्ग के 'सेवाभाव' और 'आत्मिक प्रेम' का ही बौद्ध दार्शनिक स्वरूप है।
मुख्य शिक्षाएं
- बोधिसत्व वृत्ति इस गहन बोध से उत्पन्न होती है कि 'सभी जीव मेरा ही रूप हैं और दूसरों का दुःख दूर करना वास्तव में मेरे ही चित्त का शुद्धीकरण है'।
- साधक बुद्धि के संकीर्ण प्रपंचों से ऊपर उठकर बुद्ध (अज्ञेयता) होने की अवस्था में प्रवेश करता है, परंतु अपने बचे हुए प्रारब्ध काल को वह ज्ञान प्रसार और मानव सेवा में लगाता है।
- इस वृत्ति में किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत अहंकार, स्वार्थ या सांसारिक भोग की लालसा नहीं होती; यह ज्ञानदानी साधक का सर्वोत्तम लक्षण है।
- यह द्वैत के संसार में पूरी तरह विरक्त रहकर भी अकर्ता भाव से सभी जीवों के प्रति निस्वार्थ प्रेम और मैत्रीभाव रखने की परम साधना है।