परिभाषा
- यह साधक को कर्तापन के अहंकार का त्याग करके केवल साक्षीभाव में रहकर अपनी प्राकृतिक भूमिका निभाने के लिए तैयार करता है।
मुख्य शिक्षाएं
- कर्मयोगी यह भली-भांति जानता है कि 'यह शरीर और मन केवल एक यांत्रिक संरचना हैं, मैं कर्म करने वाला नहीं हूँ, मैं केवल दृष्टा हूँ'। इस प्रकार वह कर्मों के स्वामित्व को अस्वीकार कर देता है।
- इस मार्ग पर कर्म केवल उत्तरजीविता और लोक-कल्याण के लिए सहज रूप में होते हैं, उनके पीछे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ या भय नहीं होता।
- कर्मयोग साधक को आसक्ति और भ्रामक इच्छाओं के जाल से मुक्त करके चित्तशुद्धि की ओर ले जाता है।
- चित्त के शांत और शुद्ध होने पर साधक ज्ञानमार्ग के लिए पूरी तरह अधिकारी बन जाता है, जहाँ उसे सहज रूप से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।