परिभाषा
- कर्म चित्त में चलने वाली वह चित्तवृत्ति या प्रक्रिया है जो स्मृति पटल पर अपने संस्कार (छाप) छोड़ती है।
- शरीर की बाहरी यांत्रिक गतिविधियाँ स्थूल कर्म हैं, चित्त में उठने वाले विचार, भावनाएं और इच्छाएं सूक्ष्म कर्म हैं।
- चित्त का नियम है ।
मुख्य शिक्षाएं
- कर्म पूरी तरह से कारण और प्रभाव के अकाट्य नियम से बंधा हुआ है; चित्त में उठने वाली प्रत्येक वृत्ति एक गहरी छाप छोड़ती है जो आगे चलकर नए कर्मों को प्रेरित करती है।
- सभी कर्म अंततः परिवर्तनशील होने के कारण अनुभव की श्रेणी में आते हैं; अनुभवकर्ता (साक्षी) स्वयं सर्वथा अकर्ता, निष्काम और अचल है।
- अज्ञान के कारण जीव स्वयं को कर्ता मान लेता है और कर्मों के फलों से बंध जाता है, जो उसके बार-बार जन्म लेने और दुःख पाने का मुख्य कारण बनता है।
- आत्मज्ञान होने पर जब कर्तापन का भ्रम (अहंकार) विलीन हो जाता है, तब साधक कर्म करते हुए भी कर्मों के बंधन और उनके फल से सर्वथा मुक्त हो जाता है।