साक्षीभाव


परिभाषा

  • साक्षीभाव निरंतर इस ज्ञान और बोध में स्थापित रहना है कि 'मैं कोई व्यक्ति, शरीर या मन नहीं हूँ; मैं केवल अचल अनुभवकर्ता (साक्षी) हूँ और यह परिवर्तनशील संसार केवल एक दृश्य की भांति मेरे सामने घटित हो रहा है'।

मुख्य शिक्षाएं

  • साक्षीभाव ज्ञानमार्ग की परम और एकमात्र वास्तविक साधना है; जो अज्ञान के विनाश और आत्मज्ञान के बाद स्वतः ही साधक की सहज जीवनशैली बन जाती है।
  • साक्षीभाव में रहने से चित्त में स्वतः ही समर्पण, संतोषभाव, स्वीकारभाव, निस्वार्थ प्रेम, क्षमा और मैत्रीभाव का उदय होता है।
  • इसमें सांसारिक कर्म तो अपनी प्राकृतिक गति से होते रहते हैं, परंतु साधक उनके कर्तापन के अहंकार से सर्वथा मुक्त रहता है।
  • साक्षीभाव में रहकर ही जीव धीरे-धीरे अपनी पुरानी अशुद्धियों और संचित कर्मों के बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

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