परिभाषा
- ज्ञानमार्ग पर साधक के गुणों का सतत विकास करना ही अज्ञान के विनाश और आत्मज्ञान का मुख्य उप-लक्ष्य माना गया है।
मुख्य शिक्षाएं
- अस्तित्व और अनुभवकर्ता (स्वयं) मूलतः निर्गुण (गुणों से रहित) हैं, जबकि समस्त दृश्य प्रपंच और अनुभव सगुण हैं, जहाँ सभी गुण केवल आभास मात्र होते हैं।
- ज्ञानमार्ग के साधक में कुछ अनिवार्य गुणों का होना आवश्यक है, जिनमें तीव्र जिज्ञासा, मुमुक्षत्व (मुक्ति की तीव्र इच्छा) और षट सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान) प्रमुख हैं।
- बौद्धिक स्तर पर साधक को कुशाग्र बुद्धि, तार्किकता, विवेक, ग्रहणशीलता, समालोचनात्मक दृष्टि, ईमानदारी और अतिसूक्ष्मवादी (अपनी आवश्यकताओं को न्यूनतम रखने वाला) होना चाहिए।
- गुणों और ज्ञान के बीच परस्पर सहनिर्भरता होती है; गुणों के अभ्यास से ज्ञान सुगम होता है और ज्ञान होने पर गुणों में घातीय (तीव्र) वृद्धि होती है।