तन्मात्रा


परिभाषा

  • तन्मात्रा किसी भी अनुभव का वह सबसे छोटा, अभौतिक और अविभाज्य भाग (इकाई) है जिससे कम या संकीर्ण अनुभव होना संभव नहीं है।
  • सांख्य और ज्ञानमार्ग के अनुसार, हमारे सारे अनुभव वास्तव में इंद्रियों द्वारा ग्रहण की गई तन्मात्राओं के ही होते हैं, बाह्य वस्तुओं के नहीं।

मुख्य शिक्षाएं

  • हमें कभी भी बाह्य जगत की वस्तुओं का सीधा अनुभव नहीं होता; बाह्य वस्तुएं इंद्रियों द्वारा तन्मात्राओं के रूप में परिवर्तित होकर हमारे चित्त पटल पर छपती हैं, जिसे हम अनुभव कहते हैं।
  • तन्मात्रा संवेदन का सबसे मूलभूत स्वरूप है। उदाहरण के लिए, एक सेब को विभाजित किया जा सकता है, परंतु उसकी लालिमा (लाल रंग) को और छोटे टुकड़ों में नहीं तोड़ा जा सकता; अतः लाल रंग एक तन्मात्रा है।
  • पाँच इंद्रियों से संबंधित पाँच मुख्य तन्मात्राएँ होती हैं: शब्द (ध्वनि), स्पर्श, रूप (प्रकाश/रंग), रस (स्वाद) और गंध।
  • अद्वैत के स्तर पर, ये सभी तन्मात्राएं वास्तव में अनुभवकर्ता (अस्तित्व) के ही विविध रूप हैं, जो संभावना के शून्य आकाश में तरंगों की भांति केवल प्रतीत होते हैं।

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