परिभाषा
- शरीर (या मनोशरीर यंत्र) चित्त की ही एक स्थूल परत या नादरचनाओं से निर्मित एक अत्यंत जटिल जैविक यंत्र है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, शरीर स्वयं कोई अनुभवकर्ता नहीं है, बल्कि वह चेतना के पटल पर होने वाला केवल एक अनुभव (दृश्य) है।
मुख्य शिक्षाएं
- शरीर मुख्यतः दो कोशों के रूप में अनुभूत होता है: १. स्थूल शरीर (अन्नमय कोष, जो अन्न और पंचमहाभूतों से बना है और दर्पण में दिखता है), और २. सूक्ष्म शरीर (प्राणमय कोष, जिसमें भूख, प्यास, तापमान, दर्द, थकावट और कामवासना जैसी आंतरिक इंद्रियों की संवेदनाएं आती हैं)।
- शरीर का मूल प्रयोजन इंद्रियों को आधार देना (इंद्रियों का घर बनना) है; शरीर के बिना इंद्रियां कार्य नहीं कर सकतीं।
- आत्मज्ञान होने पर साधक यह साक्षात जान लेता है कि 'मैं शरीर नहीं, बल्कि शरीर को प्रकाशित करने वाला नित्य अनुभवकर्ता हूँ'।