समर्पण का अर्थ है अहम् या व्यक्ति के अस्तित्व का पूर्ण विसर्जन। जब अज्ञान का पूर्ण नाश होता है, तो व्यक्ति का कोई अलग अस्तित्व नहीं रहता।
समर्पण कोई क्रिया नहीं है, बल्कि यह आत्मज्ञान का स्वाभाविक परिणाम है। यह अस्तित्व में पूर्ण विलय है।
समर्पण साधक का गुण भी है जो गुरु और मार्ग पर संपूर्ण विश्वास का होना है ।