परिभाषा
- जीव चित्त में चलने वाली परस्पर निर्भर वृत्तियों, प्रक्रियाओं और स्मृतियों का वह जटिल समूह है जो एक स्वतंत्र कर्ता, व्यक्ति या प्राणी के रूप में भासित होता है।
- जीव का अस्तित्व अज्ञान पर आधारित होता है और इसकी मूल वृत्ति उत्तरजीविता है।
मुख्य शिक्षाएं
- जीव स्वयं एक परिवर्तनशील अनुभव है; यह वास्तविक अनुभवकर्ता नहीं है। अज्ञान के कारण जीव स्वयं को शरीर-मन मानकर कर्ता और भोक्ता समझ बैठता है।
- जीव का मूल आधार कारण शरीर या संचित संस्कार हैं, जो जन्म और मृत्यु के चक्र को निरंतर चलाए रखते हैं।
- परमार्थ सत्य में कोई पृथक जीव नहीं है; यह केवल विश्वचित्त के भीतर उठी हुई एक अस्थायी तरंग या नामरूप है।
- ब्रह्मज्ञान होने पर जब भेदबुद्धि और अहंकार का नाश होता है, तब जीव का भ्रम समाप्त हो जाता है और वह अपने शुद्ध अद्वैत स्वरूप (ब्रह्म) में विलीन हो जाता है।