परिभाषा
- यह वह अविनाशी, अनंत, नित्य, सर्वव्यापी और देशातीत चैतन्य आधार है जिसमें प्रकट और अप्रकट दोनों विलीन हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- ब्रह्म का परम स्वभाव अद्वैत है; इसमें अनुभव (माया) और अनुभवकर्ता (साक्षी) अखंड रूप से विलीन हैं।
- ब्रह्म के दो रूप प्रतीत होते हैं: 'निर्गुण ब्रह्म' (जो अचल, अपरिवर्तनीय और शून्यता स्वरूप है) और 'सगुण ब्रह्म' (जो परिवर्तनशील विश्वचित्त या माया के रूप में क्रियाशील भासित होता है)।
- 'आत्मन ही ब्रह्म है' (अहं ब्रह्मास्मि) - यह ज्ञानमार्ग का परम अनुभव है, जो यह स्पष्ट करता है कि स्वयं के मूल तत्व और संपूर्ण ब्रह्मांड की सत्ता में बाल बराबर भी भेद नहीं है।
- ब्रह्म हमारी संकीर्ण बुद्धि और भाषा की सीमाओं से सर्वथा परे है, इसलिए मौन ही इसकी सर्वोत्कृष्ट और अंतिम व्याख्या मानी गई है।