परिभाषा
- ब्रह्मज्ञान (या अद्वैत का ज्ञान) ब्रह्म या संपूर्ण अस्तित्व की वह परम चैतन्य अवस्था है जहाँ दृश्य (अनुभव) और दृष्टा (अनुभवकर्ता) का काल्पनिक भेद पूरी तरह समाप्त होकर केवल अखंड दृष्टि (अनुभवक्रिया) ही शेष रह जाती है।
- यह वह परम ज्ञान है जिसके बाद अज्ञान के समूल नाश के साथ ही ज्ञान का भी अंत हो जाता है।
मुख्य शिक्षाएं
- ब्रह्मज्ञान कोई नया अनुभव, दिव्य प्रकाश या पराभौतिक सिद्धि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह द्वैत के काल्पनिक विभाजन का बुद्धि और अनुभव द्वारा पूर्ण खंडन मात्र है।
- इस चरम ज्ञान की प्राप्ति केवल उन्हीं को संभव है जिन्हें पूर्व में आत्मज्ञान (स्वयं के तत्व का बोध) हो चुका हो; आत्मज्ञान के बिना ब्रह्मज्ञान की बातें केवल कोरी कल्पना बन जाती हैं।
- ब्रह्मज्ञान ही ज्ञानमार्ग का अंतिम पड़ाव है; इसके आगे जानने, करने या होने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचता। यही साधक की खोज और समस्त साधनाओं का परम अंत है।
- इस अवस्था में पहुँचकर साधक यह साक्षात जान लेता है कि 'मैं ही संपूर्ण अस्तित्व हूँ, जो अपने ही मिथ्या रूपों का साक्षी है'। यहाँ 'मैं' का भी सदा के लिए अभाव हो जाता है।