परिभाषा
- भावना मन और चित्त की वे अत्यधिक सक्रिय आंतरिक क्रियाएं और गतिविधियां हैं जो उत्तरजीविता की बुनियादी आवश्यकताओं और स्मृतियों के प्रभाव से उत्पन्न होती हैं।
- ये हमारे शरीर के संचालन, वचनों और बाह्य कर्मों को सीधे निर्देशित करती हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- भावनाओं को तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है: १. स्थूल भावनाएं (भय, क्रोध, काम, लोभ — जो पशुवृत्ति हैं), २. सूक्ष्म भावनाएं (आसक्ति, दुःख, प्रसन्नता, जो मानव में मिलती हैं), और ३. उच्च भावनाएं (शांति, करुणा, क्षमा, निस्वार्थ प्रेम)।
- भावनाएं शरीर और इंद्रियों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी होती हैं; वे शारीरिक प्रणालियों और मांसपेशियों के संचलन को प्रभावित करती हैं (जैसे भय में कांपना या क्रोध में आवाज का भारी होना)।
- चूंकि भावनाएं निरंतर बदलती रहती हैं और चित्त द्वारा ही गढ़ी जाती हैं, इसलिए वे सत्य के मानदंड पर असत्य (या माया का ही एक रूप) हैं।
- साधक को अपनी भावनाओं का दास नहीं होना चाहिए; बल्कि उन्हें पूरी तरह सचेत होकर देखना और विवेकपूर्ण ढंग से नियंत्रित करना चाहिए।