माया


परिभाषा

  • माया अस्तित्व की वह भ्रामक और परिवर्तनशील संभावना है जो यथार्थ में न होते हुए भी इंद्रियों और चित्त द्वारा केवल प्रतीत (दृश्यमान) होती है।
  • 'जो नहीं है, पर वैसा प्रतीत होता है'-वही माया है। संपूर्ण अनुभव और नामरूप का यह प्रपंच ही माया है।

मुख्य शिक्षाएं

  • चित्त और माया पर्यायवाची हैं; क्योंकि इंद्रियां और चित्त मिलकर नादरचनाओं के रूप में जिस परिवर्तनशील संसार को गढ़ते हैं, वही माया है।
  • चूंकि माया का संपूर्ण ढांचा निरंतर परिवर्तनशील है, इसलिए सत्य के परम मानदंड के अनुसार यह असत्य (मिथ्या) है।
  • माया का संपूर्ण खेल नामरूप पर आधारित है। इसका अपना कोई स्वतंत्र पदार्थ या धरातल नहीं होता; इसका तत्व केवल शून्यता ही है।
  • माया स्वयं अज्ञेय है; इसके रहस्यों (विज्ञान) का विस्तार अनंत है। आत्मज्ञान होने पर जब साधक स्वयं को अचल साक्षी जान लेता है, तब वह माया के बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

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