अस्तित्व का व्यक्तित्व


अस्तित्व पूर्णतः व्यक्तित्वहीन और अव्यक्तिक है। इसमें किसी व्यक्ति विशेष के लक्षण या इच्छा नहीं पाई जाती।

मुख्य शिक्षाएं

  • व्यक्ति या व्यक्तित्व सीमा और विभाजन का गुण है, जो अहंकार और चित्त द्वारा रचा जाता है। अस्तित्व अखंड है, इसलिए इसका कोई व्यक्तिगत रूप नहीं हो सकता।
  • सभी व्यक्ति, जीव, देवी-देवता और अवतार अस्तित्व के भीतर ही प्रकट और विलीन होते हैं; अस्तित्व स्वयं इनसे परे एक व्यापक सत्ता है।
  • गुण और विशेषताएं (जैसे अच्छा-बुरा, सुख-दुःख) केवल अनुभव के स्तर पर प्रतीति मात्र हैं, अस्तित्व स्वयं निर्गुण और निर्विकार है।
  • अस्तित्व को किसी व्यक्ति की तरह इच्छा, मंशा या पक्षपात से नहीं जोड़ा जा सकता; यह अज्ञेय और अवैयक्तिक है।

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