परिभाषा
- चित्त के नियम वे सार्वभौमिक, अटल और प्राकृतिक नियम हैं जिनके माध्यम से चित्त की समस्त संरचनाएं, प्रक्रियाएं और अनुभव संचालित होते हैं।
- ये नियम किसी व्यक्ति द्वारा बनाए नहीं गए हैं, बल्कि चित्त की नाद-संरचना से स्वतः ही उत्पन्न होते हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- चित्त का सबसे पहला नियम दृष्टिसृष्टि है, जिसके अनुसार जैसी जीव की इंद्रियां और दृष्टि होती है, वैसी ही सृष्टि (अनुभव) का निर्माण होता है।
- चित्त के अन्य प्रमुख नियमों में नश्वरता (हर अनुभव का निरंतर परिवर्तनशील होना), द्वैत या ध्रुवीयता (हर अनुभव का विपरीत युग्म होना), और सापेक्षता शामिल हैं।
- चित्त स्वसमानता (छोटा रूप बड़े के समान होना), संतुलन, संकर्षण (आकर्षण-विकर्षण), सुंदरता (प्रत्येक अनुभव का अपने आप में पूर्ण होना), अंतर्सम्पर्करता, कर्म (कारण-प्रभाव), और विकासक्रम के नियमों के तहत स्वचालित रूप से कार्य करता है।
- इन नियमों को गहराई से समझकर साधक मानसिक बंधनों से मुक्त हो सकता है; क्योंकि नियमों को तोड़ा नहीं जा सकता, केवल उनके ऊपर सहज समाधि में उठा जा सकता है।