परिभाषा
- प्रगति साधक के चित्त का अज्ञान की निचली संकीर्ण परतों (जैसे पशुवृत्ति, संकीर्ण अहंकार) से मुक्त होकर चित्त की उच्च, व्यापक और प्रकाशमय परतों की ओर बढ़ने का तीव्र विकासक्रम है।
- यह दुःख और बंधनों के मार्ग को छोड़कर सत्य, शांति और स्वतंत्रता की ओर बढ़ने की गति है।
मुख्य शिक्षाएं
- वास्तविक प्रगति सांसारिक वस्तुओं, धन या संबंधों के संचय में नहीं है, बल्कि भ्रामक मान्यताओं, अंधविश्वासों और अहंकार के विसर्जन में है।
- प्रगति का सीधा संबंध साधक के गुणों के परिष्कार और चित्तशुद्धि से है; गुणों के विकास से अज्ञान का नाश सुलभ होता है और प्रगति की दर घातीय (exponential) हो जाती है।
- ज्ञानमार्ग पर प्रगति क्रमिक नहीं होती; अज्ञान का पर्दा हटते ही संपूर्ण सत्य (आत्मज्ञान) स्वतः और क्षण भर में जाग्रत हो जाता है।
- यदि साधक ज्ञान होने के बाद पुनः संसारी वासनाओं या अमान्य साधनों की ओर झुकता है, तो उसे प्रगति नहीं बल्कि पतन माना जाता है।