परिभाषा
- भ्रम (या भ्रांति) यथार्थ का वह गलत या विकृत बोध है जिसमें कोई वस्तु या अनुभव वैसा नहीं दिखता जैसा वह वास्तव में है।
मुख्य शिक्षाएं
- भ्रम के कारण ही जीव नश्वर और क्षणभंगुर अनुभवों (जैसे शरीर, मन, संबंधों) को ही अपना वास्तविक स्वरूप (सत्य) मान बैठता है।
- स्मृति के कारण परिवर्तनशील नादरचनाओं में स्थायित्व का भ्रम पैदा होता है, जिससे यह नश्वर संसार सत्य प्रतीत होने लगता है।
- अंदर-बाहर का भ्रम, कर्ता होने का भ्रम, और जन्म-मृत्यु का भ्रम — ये सभी चित्त की विभाजनकारी वृत्तियों के कारण उत्पन्न होने वाली मायावी भ्रांतियां हैं।
- आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान के उदित होते ही चित्त के सभी भ्रम स्वतः शांत हो जाते हैं और परम सत्य प्रकाशित होता है।