परिभाषा
- मूल अज्ञान (या मूल अज्ञानता) स्वयं के सत्य स्वरूप अनुभवकर्ता को न जानना और शरीर, मन या अहम् को ही 'मैं' मान बैठना है।
- इसके साथ ही, परिवर्तनशील माया को यथार्थ और सत्य मान लेना ही मूल अज्ञान कहलाता है।
मुख्य शिक्षाएं
- मूल अज्ञान ही जीव के सभी सांसारिक बंधनों, भयों, वासनाओं और दुखों का आदि कारण है।
- इसके कारण जीव स्वयं को जन्म, बुढ़ापे और मृत्यु के अधीन मानकर निरंतर भयभीत रहता है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप सर्वथा अजन्मा और अमर है।
- मनुष्य समाज में उत्पन्न होते ही मतारोपण का दास बन जाता है कि 'मैं यह शरीर हूँ और बाह्य वस्तुएं ही मेरे सुख का एकमात्र साधन हैं'।
- मूल अज्ञान का पूर्ण विनाश केवल ज्ञानमार्ग पर आत्मज्ञान (नेति-नेति) और ब्रह्मज्ञान के साक्षात बोध द्वारा ही संभव है।