परिभाषा
- सत्य के मानदंड का औचित्य इस बात की तार्किक समीक्षा है कि ज्ञानमार्ग पर सत्य का परम मापदंड 'अपरिवर्तनीयता' (जो नहीं बदलता) को ही क्यों चुना गया।
- यह सबसे कठोर, अडिग और निश्चित सत्य तक पहुँचाने वाला तार्किक मापदंड है।
मुख्य शिक्षाएं
- चूंकि सत्य सापेक्ष और व्यक्तिगत संदर्भों में बदलता रहता है, इसलिए परम सत्य तक पहुँचने के लिए एक ऐसे मानदंड की आवश्यकता थी जो सभी परिस्थितियों में अडिग रहे।
- इस मानदंड का औचित्य यह है कि जो वस्तु या अनुभव बदल जाता है, उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व या तत्व नहीं होता; वह केवल एक क्षणिक नामरूप (माया) है।
- जो बदलता नहीं है (जैसे अनुभवकर्ता), केवल वही नित्य, स्वयंसिद्ध और सत्य हो सकता है। यह मानदंड साधक को भ्रम, मतारोपण और कल्पनाओं के दलदल से सुरक्षित रखता है।
- इस कठोर मानदंड के बिना संपूर्ण तत्व ज्ञान भ्रामक और अस्थाई हो जाता; अतः तत्व की अपरिवर्तनीयता ही सत्य का अंतिम औचित्य है।