परिभाषा
- स्थान (या खाली जगह/आकाश) चित्त द्वारा इंद्रियों के संकेतों को सुव्यवस्थित करने के लिए गढ़ी गई एक भ्रामक परिकल्पना है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, अस्तित्व और अनुभवकर्ता पूर्णतः स्थानहीन (देशातीत) हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- स्वतंत्र रूप से किसी भौतिक स्थान का कोई अस्तित्व नहीं है; बल्कि स्थान स्वयं चित्त पटल पर अनुभूत होने वाली केवल एक घटना या अनुभव मात्र है।
- अनुभव किसी स्थान विशेष में नहीं होते, बल्कि सभी स्थानों, दिशाओं और लोकों का ही अनुभवकर्ता को अनुभव होता है।
- अज्ञान के कारण जीव दूरी और स्थान को सत्य मान लेता है, जबकि अपरोक्ष अनुभव और तर्क यह प्रमाणित करते हैं कि अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच बाल बराबर भी दूरी नहीं है।
- चूंकि अनुभवकर्ता का कोई स्थान नहीं है, इसलिए वह सर्वव्यापी और असीम है; संपूर्ण ब्रह्मांड उसी के भीतर समाहित है।