परिभाषा
- निवृत्ति चित्त की वह उच्चतर अवस्था है जिसमें साधक सांसारिक प्रपंचों, अशुद्धियों और निचली परतों के व्यर्थ बंधनों से स्वाभाविक रूप से पीछे हट जाता है।
- यह बाह्य संसार की ओर भागने की क्रिया (प्रवृत्ति) का सर्वथा विपरीत स्वरूप है।
मुख्य शिक्षाएं
- जब साधक के भीतर विवेक जाग्रत होता है और उसे दृश्य जगत की क्षणभंगुरता (माया) का बोध होता है, तो सांसारिक लिप्तता से उसकी निवृत्ति (विरक्ति) स्वतः ही होने लगती है।
- निवृत्ति का अर्थ हठपूर्वक कर्मों को छोड़ना नहीं है, बल्कि चित्त के स्तर पर वासनाओं और अनावश्यक सांसारिक आकर्षणों की व्यर्थता को देख कर उनसे तटस्थ हो जाना है।
- जब साधक का चित्त निचली संसारी प्रवृत्तियों से निवृत हो जाता है, तभी उसे ऊपरी उच्च परतों (जैसे साक्षीभाव और चेतना) में अवस्थित होने का वास्तविक अवसर मिलता है।
- यह साधक को अतिसूक्ष्मवादी आचरण की ओर ले जाती है, जो गंभीर मनन और आत्म-साक्षात्कार के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करता है।