संदेह


परिभाषा

  • संदेह (या संशय) चित्त की वह दोलायमान मानसिक अवस्था है जिसमें एक ही वस्तु या विषय के बारे में परस्पर विरोधी या भिन्न-भिन्न विशेषताओं का एक साथ भान होता है।
  • न्याय दर्शन के अनुसार, यह केवल निश्चय का अभाव नहीं है, बल्कि विरोधाभासी गुणों का एक साथ उपस्थित होना है।

मुख्य शिक्षाएं

१. समान गुणधर्मों के कारण उत्पन्न होने वाला भ्रम (जैसे ऊँची वस्तु देखकर मनुष्य या ठूँठ का संशय), २. विशिष्ट और असाधारण गुणों से उत्पन्न संशय (जैसे ध्वनि का नित्य या अनित्य होना), ३. विरुद्ध मतभेदों और तर्कों के कारण संशय, ४. उपलब्धि की अनियमितता (जैसे मृगजल और वास्तविक जल), ५. अनुपलब्धि या सीधे बोध के अभाव में उत्पन्न होने वाला संशय।
  • अज्ञानी व्यक्ति का यह लक्षण होता है कि उसे परम सत्य पर तो तुरंत संदेह होता है, परंतु असत्य और अफ़वाहों पर वह आंखें मूंदकर विश्वास कर लेता है।

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