परिभाषा
- ज्ञानी वह व्यक्ति है जिसका मूल अज्ञान नष्ट हो चुका है और जिसे यह प्रत्यक्ष बोध हो गया है कि वह कोई मनोशरीर यंत्र या अहम् नहीं, बल्कि नित्य अनुभवकर्ता (साक्षी) है।
- ज्ञानी वह है जो सत्य और असत्य का पूर्ण भेद जानकर सदैव अपने वास्तविक स्वरूप में अवस्थित रहता है।
- ज्ञानी भी मिथ्या है , वास्तव में कोई ज्ञानी नहीं है । परंतु अज्ञान का नाश मात्र है ।
मुख्य शिक्षाएं
- ज्ञानी सदैव साक्षीभाव में रहता है; उसके लिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, और जीवन-मृत्यु का कोई द्वैत नहीं रहता, वह इन सभी को केवल एक खेल या स्वप्न की भांति देखता है।
- ज्ञानी कभी व्यर्थ के वाद-विवाद में नहीं पड़ता। वह या तो मौन रहता है, सीखता है, या फिर करुणावश मुमुक्षुओं की शंकाओं का समाधान कर उन्हें ज्ञान प्रदान करता है।
- ज्ञानी के जीवन में स्वतः ही विरक्ति, अनासक्ति, परम शांति, निर्भयता और आनंद का उदय होता है। उसका आचार-विचार और व्यवहार स्वतः ही शुद्ध और अहिंसक हो जाता है।
- परमार्थ सत्य या अद्वैत के परम शिखर पर 'ज्ञानी' नाम की भी कोई पृथक सत्ता नहीं बचती, क्योंकि वहाँ ज्ञान और ज्ञानी दोनों ही अस्तित्व या ब्रह्म में पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।