आनंद


परिभाषा

  • आनंद अनुभवकर्ता (या स्वयं) का वास्तविक और अपरिवर्तनीय स्वभाव है। यह किसी बाह्य वस्तु, अनुकूल परिस्थिति या इंद्रिय जनित सुख पर आश्रित नहीं है, बल्कि यह सभी वृत्तियों के शांत होने पर प्रकट होने वाली अखंड शांति है।

मुख्य शिक्षाएं

  • इंद्रिय जनित सुख (या भोग) क्षणिक और परिवर्तनशील होते हैं जिनके जाने पर दुःख आता है; इसके विपरीत, आनंद नित्य है जो कभी नष्ट नहीं होता।
  • आनंद का अर्थ उत्तेजना या अत्यधिक उल्लास का सांसारिक आवेग नहीं है, बल्कि यह न कोई कल की चिंता, न कोई दुख, न इच्छा, न कुछ पाने या खोने की चाह — केवल 'होना मात्र' की गहन शांति है।
  • जब चित्त से 'मैं' और 'मेरा' का तादात्म्य समाप्त हो जाता है और अहम् विलीन हो जाता है, तब आत्मा का स्वभाव जो आनंद है, स्वतः ही प्रकट हो जाता है।
  • अनुभवकर्ता स्वयं आनंद स्वरूप है; जब साधक आत्मज्ञान में स्थित होकर साक्षीभाव में जीता है, तब आनंद उसके जीवन की स्थायी पृष्ठभूमि बन जाता है।

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