चित्त की अवस्थाएँ


परिभाषा

  • चित्त की अवस्थाएँ चित्त की उन विभिन्न वृत्तियों और सक्रिय प्रक्रियाओं के समूह को दर्शाती हैं जो समय और संदर्भ के अनुसार चक्रीय रूप में बदलती रहती हैं।
  • एक समय में जो वृत्तियों का समूह सक्रिय होता है, वही चित्त की तात्कालिक अवस्था का निर्धारण करता है।

मुख्य शिक्षाएं

  • मुख्य रूप से चित्त की तीन अवस्थाएं सर्वमान्य हैं: जागृत (जिसमें बाह्य इंद्रियां और भौतिक जगत सक्रिय होते हैं), स्वप्न (जिसमें बाह्य इंद्रियां निष्क्रिय किंतु आंतरिक मानसिक रचनाएं सक्रिय होती हैं), और निद्रा (जिसमें बाह्य व आंतरिक वृत्तियों का अभाव होता है)।
  • जागृत अवस्था के अंतर्गत भी चित्त की अनेक उप-अवस्थाएं पाई जाती हैं, जैसे विक्षिप्त, अशांत, मूर्ख, अहंकारी, अस्थिर, बहिर्मुखी, अंतर्मुखी, तर्कसंगत, एकाग्र और स्थितप्रज्ञ चित्त।
  • ये सभी अवस्थाएं परिवर्तनशील और अनित्य होने के कारण सत्य के मानदंड पर असत्य (मिथ्या) हैं।
  • अनुभवकर्ता इन सभी बदलती हुई अवस्थाओं से सर्वथा अप्रभावित रहकर इनका साक्षी होता है।
  • जब चित्त पूरी तरह शांत होकर किसी भी भेद या विभाजन से रहित हो जाता है, तो उसे सहज समाधि या तूर्या अवस्था कहा जाता है।

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