परिभाषा
- जन्म वास्तव में इंद्रियों का उद्भव या प्रकटीकरण है। जब चित्त की परतें स्थूल रूप धारण करके इस भौतिक जगत से संपर्क स्थापित करती हैं, तो उसे जन्म कहा जाता है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, जन्म केवल शरीर और इंद्रियों का होता है; अनुभवकर्ता का नहीं।
मुख्य शिक्षाएं
- जन्म केवल नादरचनाओं से निर्मित भौतिक शरीर और आंगिक प्रणालियों का होता है; अनुभवकर्ता (स्वयं) सर्वथा अजन्मा, नित्य और स्वयंभू है।
- जीव अपने कारण शरीर में संचित पुराने संस्कारों, वासनाओं और कर्मों के कारण नया शरीर (पुनर्जन्म) धारण करने के लिए बाध्य होता है।
- जन्म और मृत्यु माया के चक्रीय नियमों के अंतर्गत आने वाली परिवर्तनशील घटनाएं हैं, जो अंततः असत्य (मिथ्या) हैं।
- आत्मज्ञान प्राप्त होने पर जब जीव के कर्तापन का अहंकार नष्ट हो जाता है, तब वह जन्म-मृत्यु के इस अंतहीन चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।