परिभाषा
- तुरीय (या तूर्या अवस्था) चेतना की वह परम और अखंड स्थिति है जो जागृत, स्वप्न और निद्रा तीनों अवस्थाओं की पृष्ठभूमि है।
- यह कोई चित्त की अवस्था नहीं है, बल्कि स्वयं अनुभवकर्ता की शुद्ध, नित्य और अद्वैत स्थिति है।
मुख्य शिक्षाएं
- जागृत, स्वप्न और निद्रा जैसी अवस्थाएं आती-जाती हैं, लेकिन तुरीय इन सभी के होने और न होने का साक्षी होने के कारण सदा नित्य और अपरिवर्तनीय रहता है।
- तुरीय अवस्था को ही सहज समाधि या अनुभवक्रिया भी कहा जाता है, जहाँ अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच का सारा काल्पनिक भेद सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
- यह स्थिति कुछ नया करने या पाने से नहीं आती, बल्कि चित्त के विभाजनकारी भ्रम और अज्ञान के पूरी तरह शांत होने पर स्वतः ही प्रकाशित होती है।
- तुरीय ही ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप है, जिसमें साधक 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार से सर्वथा मुक्त होकर अखंड शांति और अज्ञेयता में अवस्थित रहता है।