तुरीय


परिभाषा

  • यह कोई चित्त की अवस्था नहीं है, बल्कि स्वयं अनुभवकर्ता की शुद्ध, नित्य और अद्वैत स्थिति है।

मुख्य शिक्षाएं

  • जागृत, स्वप्न और निद्रा जैसी अवस्थाएं आती-जाती हैं, लेकिन तुरीय इन सभी के होने और न होने का साक्षी होने के कारण सदा नित्य और अपरिवर्तनीय रहता है।
  • यह स्थिति कुछ नया करने या पाने से नहीं आती, बल्कि चित्त के विभाजनकारी भ्रम और अज्ञान के पूरी तरह शांत होने पर स्वतः ही प्रकाशित होती है।
  • तुरीय ही ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप है, जिसमें साधक 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार से सर्वथा मुक्त होकर अखंड शांति और अज्ञेयता में अवस्थित रहता है।

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