परिभाषा
- पीड़ा (या दुःख) चित्त की वह संवेदनात्मक और भावनात्मक अशांति है जो शरीर में किसी नुकसान या क्षति (शारीरिक पीड़ा) अथवा मन के स्तर पर भ्रामक आसक्ति और इच्छाओं के टूटने (मानसिक पीड़ा) से उत्पन्न होती है।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, पीड़ा मूलतः अज्ञान और भ्रामक तादात्म्य का सीधा परिणाम है।
मुख्य शिक्षाएं
- शारीरिक पीड़ा वास्तव में चित्त की एक 'सूचक प्रक्रिया' है, जो अंतरेंद्रियों के माध्यम से शरीर में होने वाली किसी टूट-फूट या विसंगति की सूचना देती है ताकि जीव की उत्तरजीविता सुनिश्चित हो सके।
- मानसिक पीड़ा तब उत्पन्न होती है जब जीव इस परिवर्तनशील और नश्वर संसार की वस्तुओं, लोगों और संबंधों के प्रति तीव्र आसक्ति रखता है और उन्हें पकड़े रखने का निरर्थक प्रयास करता है।
- चित्त की पुरस्कार और दंड प्रणाली के अंतर्गत पीड़ा को 'दंड' के रूप में अनुभव किया जाता है, जो जीव को हानिकारक आचरणों से दूर रहने के लिए बाध्य करती है।
- चूंकि पीड़ा एक परिवर्तनशील और अस्थायी अनुभव है, इसलिए यह सत्य के मानदंड पर असत्य (मिथ्या) है। आत्मज्ञान होने पर जब साधक स्वयं को शरीर-मन से सर्वथा मुक्त अनुभवकर्ता के रूप में जान लेता है, तो वह सभी पीड़ाओं से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।