परिभाषा
- भोग वृत्ति (या भोगवृत्ति) चित्त की वह संकीर्ण वृत्ति या प्रवृत्ति है जो शारीरिक और इंद्रिय जनित सुख (जैसे स्वादिष्ट भोजन, विलासिता, कामक्रीड़ा) को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लेती है।
- यह इंद्रियों के माध्यम से बाह्य सुख प्राप्त करने की अज्ञानपूर्ण चेष्टा है।
मुख्य शिक्षाएं
- भोग वृत्ति अज्ञान और पशुवृत्ति पर टिकी है, जहाँ जीव यह मान लेता है कि सुख केवल बाहरी वस्तुओं और भोग-सामग्रियों में ही स्थित है।
- भोग वास्तव में क्षणिक सुख है, जो इंद्रियों की उत्तेजना शांत होने पर समाप्त हो जाता है और शीघ्र ही पीड़ा या दुःख में बदल जाता है (पी२पी नियम)।
- चित्त का नियम है कि किसी भी भोग को बार-बार अति करने से इंद्रियां अरुचिकर हो जाती हैं और वही भोग दुःख का कारण बन जाता है।
- साधक के लिए भोगों का पूरी तरह त्याग आवश्यक नहीं है, परंतु उन पर पूर्ण नियंत्रण, अनासक्ति और वैराग्य का होना अनिवार्य है।