परिभाषा
- सेवा (या सेवाभाव) अद्वैत बोध और करुणा से उत्पन्न होने वाला वह निष्काम कर्म है जिसके द्वारा साधक दूसरों को अज्ञान और दुखों से मुक्त करने में सहयोग करता है।
- यह स्वयं के संकीर्ण स्वार्थों से परे संपूर्णता का आदर करने की क्रिया है।
मुख्य शिक्षाएं
- सच्ची सेवा किसी बाह्य उपकार या अहंकार से प्रेरित नहीं होती; जब आत्मज्ञान होने पर यह साक्षात दिखता है कि 'सभी मेरा ही रूप हैं', तो सेवा स्वतःस्फूर्त होने लगती है।
- ज्ञानमार्ग पर सबसे उत्कृष्ट और बड़ी सेवा ज्ञान दान (ज्ञान प्रसार) है; ताकि अन्य जिज्ञासुओं को भी अज्ञान के अंधकार से मुक्त किया जा सके।
- स्वार्थ हमेशा जीव का पतन करवाता है और दुःख देता है, जबकि निस्वार्थ सेवा भाव चित्त को निर्मल और अचल शांति में स्थापित करता है।
- सेवा कर्मों के अहंकार से मुक्त होने का एक अत्यंत सुंदर आचरण है, जो मुक्ति का ही एक लक्षण है।