परिभाषा
- मिथ्या (या असत्य) वह है जो परिवर्तनशील, अनित्य और क्षणभंगुर है, जिसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व या तत्व नहीं होता और जो केवल भ्रमवश प्रतीत होता है।
- ज्ञानमार्ग के सत्य के मानदंड के अनुसार, जो बदलता है वह मिथ्या है।
मुख्य शिक्षाएं
- जगत, शरीर और मन के अंतर्गत आने वाले समस्त अनुभव मिथ्या हैं, क्योंकि वे समय और परिस्थितियों के अनुसार क्षण-क्षण बदल रहे हैं।
- मिथ्या का अर्थ यह नहीं है कि उसकी प्रतीति नहीं होती; बल्कि इसका अर्थ यह है कि उसका होना केवल एक आभास मात्र है, जैसे स्वप्न में देखा गया संसार या रस्सी में सांप का भ्रम।
- स्मृति के कारण परिवर्तनशील नादरचनाओं में स्थायित्व का जो भ्रम पैदा होता है, उसी से मिथ्या जगत वास्तविक और सत्य प्रतीत होने लगता है।
- आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान के द्वारा जब यह स्पष्ट हो जाता है कि 'मैं केवल साक्षी हूँ और बाकी सब दृश्य है', तब संपूर्ण मिथ्या प्रपंच का भ्रम स्वतः समाप्त हो जाता है।