परिभाषा
- साक्षी (या दृष्टा) वह नित्य, अपरिवर्तनीय और शुद्ध चैतन्य अनुभवकर्ता है जो चित्त में होने वाले सभी अनुभवों, विचारों और अवस्थाओं को बिना प्रभावित हुए केवल देखता है।
- यह देखने वाला स्वयं है, इसलिए इसे कभी भी अनुभव की वस्तु नहीं बनाया जा सकता।
मुख्य शिक्षाएं
- साक्षी को कभी भी अनुभव (दृश्य) की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं सबको प्रकाशित करने वाला है। वह स्वयंप्रकाशित और स्वतः सिद्ध है।
- संपूर्ण दृश्य ब्रह्मांड, शरीर की संवेदनाएं और मन की वृत्तियां साक्षी के प्रकाश में ही प्रकाशित होती हैं, परंतु साक्षी इनमें से किसी से भी लिप्त नहीं होता।
- अज्ञान के कारण जीव स्वयं को साक्षी न मानकर शरीर-मन मान लेता है; आत्मज्ञान होने पर जब इस भ्रम का नाश होता है, तो वह केवल साक्षीभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है।
- साक्षी और अनुभवकर्ता एक ही परम सत्य के भिन्न-भिन्न पर्यायवाची नाम हैं।