परिभाषा
- चित्त में होने वाली विभिन्न गतिविधियां ही अवस्थाओं को जन्म देती हैं, जो कि निरंतर बदलती रहती हैं।
मुख्य शिक्षाएं
- जागृत अवस्था में इंद्रियां और बुद्धि सक्रिय रहती हैं और बाह्य जगत एवं शरीर का अनुभव कराती हैं।
- स्वप्न अवस्था में बाह्य इंद्रियां शिथिल होती हैं और चित्त मानसिक रचनाओं एवं कल्पनाओं का अनुभव कराता है।
- निद्रा (सुषुप्ति) अवस्था में सभी प्रकार के बाह्य और आंतरिक अनुभवों का अभाव होता है, जहां अज्ञान और ज्ञान दोनों से क्षणिक मुक्ति मिलती है।
- सहज समाधि या तूर्या वह चौथी अवस्था है जो सभी अवस्थाओं की पृष्ठभूमि है, जहां अनुभवकर्ता और अनुभव का विलय हो जाता है।
- अवस्थाएं निरंतर बदलती रहती हैं, इसलिए वे असत्य (मिथ्या) हैं। अनुभवकर्ता एकमात्र नित्य और स्थायी तत्व है जो सभी अवस्थाओं का साक्षी है।