परिभाषा
- स्वप्न अवस्था चित्त की वह सूक्ष्म_अवस्था है जिसमें बाह्य इंद्रियां पूरी तरह शिथिल हो जाती हैं, परंतु मन अपनी ही संचित स्मृतियों और कल्पनाओं के द्वारा एक पूरे आभासी संसार की रचना करके उसका संवेदन करता है।
- यह चेतना की तीन प्रमुख अवस्थाओं में से दूसरी है।
मुख्य शिक्षाएं
- स्वप्न पूरी तरह से स्मृति पर आधारित मानसिक अनुभव हैं, जो जब तक चलते हैं तब तक पूरी तरह से सत्य प्रतीत होते हैं।
- ज्ञानमार्ग के अनुसार, स्वप्न का जगत और जागृत का जगत दोनों ही चित्त की वृत्तियाँ हैं; दोनों में केवल स्थायित्व और नियमितता की मात्रा का अंतर है, परमार्थतः दोनों ही असत्य (मिथ्या) हैं।
- योगी और ज्ञानी अपनी चेतना को इतना जाग्रत कर लेते हैं कि उन्हें स्वप्न के दौरान भी स्वप्न होने का भान (जाग्रत स्वप्न) रहता है और वे उस पर नियंत्रण कर सकते हैं।
- अनुभवकर्ता जागृत, स्वप्न और निद्रा तीनों अवस्थाओं में सर्वथा एक समान रहकर सभी परिवर्तनों को प्रकाशित करता है।