परिभाषा
- जाति वृत्ति चित्त की वह जन्मजात और प्राकृतिक वृत्ति है जो किसी जीव को अपने जैसी शारीरिक संरचना, व्यवहार या संप्रदाय वाले जीवों के साथ झुंड बनाकर रहने के लिए प्रेरित करती है।
- यह सामाजिक सुरक्षा और उत्तरजीविता को सुगम बनाने की एक आवश्यक प्रक्रिया है।
मुख्य शिक्षाएं
- जाति वृत्ति मुख्य रूप से स्तनपायी चित्त और मानव चित्त की परतों में सक्रिय होती है, जिससे जीव को अकेले रहने के बजाय समूह में रहने से भय का निवारण और उत्तरजीविता का लाभ मिलता है।
- अज्ञान के कारण मनुष्य इस वृत्ति को संकुचित कर लेता है और जातिवाद, संप्रदायवाद, नस्लवाद या अंधराष्ट्रवाद जैसी भ्रामक सीमाओं में बंध जाता है।
- यह वृत्ति जीव में भेदबुद्धि ('मैं और मेरे लोग श्रेष्ठ हैं, बाकी सब पराये या निम्न हैं') को बढ़ाती है, जो अंततः समाज में घृणा, क्लेश और हिंसा का कारण बनती है।
- आत्मज्ञान होने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जाति, नस्ल, लिंग या संप्रदाय केवल स्मृति के आरोपित आवरण हैं; यथार्थ में सबका मूल तत्व केवल एक ही अनुभवकर्ता है।