परिभाषा
- पुनर्जन्म कारण शरीर या जीवस्मृति में संचित पुराने कर्मों, अधूरी वासनाओं और संस्कारों के प्रभाव से जीव द्वारा पुनः नया भौतिक शरीर धारण करने की चक्रीय प्रक्रिया है।
- ज्ञानमार्ग के परम सत्य के मानदंड पर, पुनर्जन्म असत्य (महामाया) है क्योंकि आत्मा कभी जन्म नहीं लेती।
मुख्य शिक्षाएं
- जब तक साधक में मूल अज्ञान और संसार के प्रति अधूरी इच्छाएं बची रहती हैं, तब तक स्मृतियों का दृढ़ अवरोध (जड़त्व) दो जन्मों के बीच सेतु बनाए रखता है।
- पुनर्जन्म वास्तव में अनुभवकर्ता (साक्षी) का नहीं होता, क्योंकि वह तो अजन्मा, नित्य और अचल है; यह केवल चित्त की परतों और संचित संस्कारों का ही पुनरागमन है।
- अज्ञान के कारण ही जीव स्वयं को शरीर मान लेता है और जन्म-मृत्यु के इस भ्रामक चक्र को सत्य मानकर निरंतर दुःख भोगता है।
- आत्मज्ञान होने पर जब वासनाओं का क्षय होता है और चेतना का विकासक्रम तीव्र हो जाता है, तो पुनर्जन्म का यह सिलसिला सदा के लिए समाप्त (थम) जाता है।